5/03/2021

रणदीप गुलेरिया बनाम बहादुर पत्रकार: नैरेटिव सेट करने का खेल!

रणदीप गुलेरिया बनाम बहादुर पत्रकार:  नैरेटिव सेट करने का खेल! 

विनीत उत्पल

सोशल मीडिया में किस तरह नैरेटिव सेट करने का खेल चलता है और कैसे किसी को टारगेट किया जाता है, यह बखूबी एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार और इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर रहे दिलीप मंडल से सीखा जा सकता है. रवीश कुमार दो मई, 2020 को एम्स के निदेशक डॉक्टर रणदीप गुलेरिया को टारगेट करते हैं, वहीं इसके अगले दिन दिलीप मंडल अपने फेसबुक पेज पर उनके ज्ञान सीमित होने की बात कहते हैं. रवीश कुमार और दिलीप मंडल दोनों हिन्दी के बड़े पत्रकार माने जाते हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से अपनी अज्ञानता का परिचय दे रहे हैं, वह भारतीय मीडिया के लिए सोचनीय बात है. दोनों कैसे नैरेटिव सेट करने का काम करते हैं, यह बखूबी देखा जा सकता है. यह बात और है कि उनके द्वारा नैरेटिव सेट करने की कोशिश हमेशा फेल होती रही है.  

जो दिलीप मंडल विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं, अच्छे अध्येता हैं, देश के प्रख्यात जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से पीएचडी कर रहे हैं और वह भी प्रख्यात दलित चिन्तक और बेहतरीन स्कॉलर प्रो. विवेक कुमार के सान्निध्य में, ऐसे में जब वे अपनी फेसबुक पोस्ट पर कुछ मीडिया पोर्टल पर छपे ख़बरों का स्क्रीन शार्ट डालकर किसी व्यक्ति को लेकर झूठ औरु मनगढ़ंत बातें लिखते हैं कि रणदीप गुलेरिया वायरोलॉजी या एपिडेमोलॉजी का कोई बड़ा नाम नहीं है. उन विषयों पर उनका ज्ञान सीमित है. उनकी ख़ासियत ये है कि वे अटल से लेकर जेटली और सुषमा स्वराज जैसे बीजेपी नेताओं के निजी डॉक्टर रहे हैं. तीनों अब नहीं. वाजपेयी के घर जाकर उनकी देखभाल करने का इनाम उन्हें मिला है. इन दिनों उन्हें केंद्र सरकार का बचाव करने का ज़िम्मा दिया गया है.

अपनी बातों में वे यह नैरेटिव सेट कर देते हैं कि जिन तीन नेताओं के वे निजी डॉक्टर रहे हैं, उनका इलाज उन्होंने सही तरीके से नहीं किया और यह कारण है कि वे इस दुनिया में नहीं हैं. जेएनयू जैसे ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय के शोधकर्ता होने के बाद भी दिलीप मंडल को यह नहीं मालूम है कि अकादमी जगत में किसी की काबिलियत किसी समाचार पत्र या पोर्टल में खबर प्रकाशित होने से नहीं बल्कि ‘गूगल स्कॉलर’ में उनके शोध आलेखों के ‘साइटेशन’, ‘एच-इंडेक्स’, ‘आई10 इंडेक्स’ के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है. दिलीप मंडल को शायद ही पता हो कि जिस प्रो. रणदीप गुलेरिया को लेकर नैरेटिव सेट कर रहे हैं, उनका अभी तक कुल 648 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. उनके शोध पत्रों के कुल 8734 साइटेशन हो चुके हैं, जिनमें से सन 2016 से अभी तक कुल 4994 साइटेशन हुए हैं (संदर्भ: https://scholar.google.com/citations?user=7znySqUAAAAJ&hl=en&oi=ao). उनका एच इंडेक्स 43 और आई10 इंडेक्स 171 है.

चूँकि दिलीप मंडल मीडिया में संपादक रहे हैं तो उन्हें मालूम है कि कैसे अर्धसत्य लिखकर किसी के खिलाफ नैरेटिव तैयार किया जाता है और मीडिया का ‘अंडरवर्ल्ड’ कैसे काम करता है. यही कारण है कि वे मीडिया में पोर्टल और समाचार एजेंसियों के लिंक दिखा कर आम लोगों को बरगलाने की कोशिश करते हैं कि रणदीप गुलेरिया की छवि को ख़राब करने की पुरजोर कोशिश करते हैं. वे लोगों को जब यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि डॉक्टर गुलेरिया बीजेपी के कई नेताओं के निजी चिकित्सक रहे हैं और उन्हें इसका इनाम मिला है. ऐसे में वे यह यह बताना क्यों भूल जाते हैं कि वे लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कार्यकर्ताओं को सोशल मीडिया का प्रशिक्षण देने गए थे तो उन्हें इसके एवज में क्या मिला.? क्या देश में उनसे बेहतर सोशल मीडिया का ट्रेनर नहीं था या फिर वे किस जुगार से गए. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में अध्यापन करने कि नियुक्ति किस इनाम के तहत हुई थी. क्या यह मान लें कि दिलीप मंडल ‘सेक्स’ एक्सपर्ट में बड़े नाम थे इसलिए इंडिया टुडे का एक अंक ‘सेक्स’ के नाम पर निकलने की जिम्मेदारी दी गई थी? क्या किसी डॉक्टर का किसी नेता का इलाज करना अपराध है? आँखों पर पट्टी बंधे रहने पर हाथी का पूंछ रस्सी जैसा ही लगता है.   

वहीं, रवीश कुमार नैरेटिव सेट करने के लिए भावनात्मक मानसिकता का सहारा लेते हैं और लिखते हैं, “रणदीप गुलेरिया भारत के सबसे बड़े अस्पताल एम्स के निदेशक हैं। भारत की जनता सड़कों पर मर रही है। वह इस अस्पताल से उस अस्पताल की तरफ़ भाग रही है। दम तोड़ दे रही है। आप मुझे बताइये कि इस संकट में एम्स का क्या रोल होना चाहिए? क्या उसका निदेशक इतना ख़ाली है कि दिन भर टीवी पर इंटरव्यू देता रहता है? मुझे जवाब चाहिए। मैं किसी रिसर्चर से अपील करूँगा कि वह अध्ययन करे कि अप्रैल महीने में डॉ रणदीप गुलेरिया ने कितने घंटे टीवी पर बिताए। रिसर्चर जब देखे कि हर शो में कितनी देर तक डॉ रणदीप गुलेरिया बैठे हैं तो केवल वही समय न जोड़े। बल्कि उसके आगे पीछे का दस पंद्रह मिनट भी जोड़े। इस तरह से आप दुनिया को बता सकते हैं कि जब लोग मर रहे थे तब एम्स का निदेशक इतना ख़ाली था कि वह दिन भर टीवी पर इंटरव्यू दे रहा था कि क्या करना है।“

यानी पूरी तरह लोगों को उकसाने का काम रवीश कुमार कर रहे हैं और लोगों को इशारे से बता रहे हैं कि क्या करना है. ऐसा लिखने के पहले वे भूल जाते हैं कि डॉ रणदीप गुलेरिया कम से कम प्रेस ब्रीफिंग कर लोगों को जानकारियां दे रहे हैं लेकिन कुछ वक्त पहले जब अमेरिकी चुनाव था, तब जिस तरह एनडीटीवी ने निधि राजदान को अमेरिकी विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर दिखकर कैसे एक नैरेटिव सेट की थी. चलिए एक बार मान लें कि एनडीटीवी को नहीं पता हो कि निधि राजदान के बारे में लेकिन जब पता चल ऊसके झूठ का, तब ऊसने क्या कार्रवाई की, क्या यह किसी को मालूम है? क्या सरकार का ‘सेव टाइगर’ परियोजना रवीश कुमार के चैनल के लिय ही था? अपने झूठ को छिपाकर काले चश्मे से दूसरों को देखना बहुत आसान होता है लेकिन अंधे को यह पता नहीं चलता कि वह जो चस्मा पहना हुआ है, उसमें लगे सीसे का कोई उपयोग उसके लिए नहीं है.     

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