1/25/2016

जीवन कर्जा गाड़ी है

लिखने वाले लिख लेंगे तो पढ़ने वाले पढ़ लेंगे
हम अपनी औक़ात बराबर कुछ तो सीढ़ी चढ़ लेंगे
------
इस दौर की सियासत पे कोई कोई नहीं लिखता
क्या इसलिए कि शायरों को मौत का डर है
------
चाँद तारे झिलमिलाते हैं मगर अब भी कभी
हुस्न का हँसता हुआ चेहरा नूरानी अब कहाँ
------
सारे ताकत झोंकी लेकिन बाँट नहीं पाये, अब भी
मुल्ला के घर रामलला है पंडित के घर मौला है
------
गजल का फलक काफी व्यापक है.ऐसे में जब पत्रकार और फिल्मकार अविनाश दास के 88 गजलों का संग्रह ' जीवन कर्जा गाड़ी है' आया है तो जाहिर है कि इन गजलों को विभिन्न स्तरों पर जांचा-परखा जाएगा. हालांकि यह काम गजलों के व्याकरणाचार्य करेंगे लेकिन आम पाठकों को इससे क्या लेना-देना.
पाठकों को जो अच्छा लगेगा, वही पढ़ेगा चाहे तथाकथित विद्वान जो कहें. पढ़ने का यह चाव वैसा ही है जैसे फिल्म देखना. शायद ही दर्शक कभी फिल्म समीक्षक की राय और स्टार मार्क को देख फिल्म देखने जाता है. ऐसे विरोधाभाष युग में वही गजल लोगों के सिर चढ़ेगा जो आम आदमी की जबान होगी और इस बात को अविनाश बेहतर जानते हैं.
इनकी गजलों में प्रेम है, ग्रामीण स्मृतियां हैं, शहरी चौराहे हैं, आधुनिकता है और इससे बढ़कर हर शब्दों में एक अलग अपनापन है. कुल 96 पेज की इस किताब का हर पन्ना एक दस्तावेज है क्योंकि जब आप इसे पढ़ना शुरू करेंगे तो एक सांस में पूरी किताब पढ़ डालेंगे. कुछ गजल गुदगुदाएंगे तो कुछ आपके नशों में कुछ कर गुजरने का रक्तसंचार करेंगे. कुछ ललकारेंगे तो कुछ सुर-ताल में सजाने के लिए आपको मजबूर करेंगे.
मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर और अाने वाली फिल्म 'अनारकली आरावाली' के निर्देशक अविनाश जी का यह संग्रह अंतिका प्रकाशन से आया है. मैं तो एक बैठक, एक सांस में पढ़ गया, रात सर्द है, अंधेरा गहरा है, स्ट्रीट लाइट की रोशनी मद्धिम है, दिन के उजाले का पता नहीं, दिल्ली में प्रदूषण कब कम होगा, मालूम नहीं. लेकिन समय बदलेगा, दुनिया बदलेगी इसकी चाह में अविनाश के ये शब्द 'यह मौसम शतरंजी है सो संभल संभल के चलो, उसका क्या, वह मस्त मलंगा मतवाला मारक वजीर है' गुनगुना रहा हूं.
नोट: नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में हॉल नंबर-12 में अंतिका प्रकाशन के स्टाल पर अविनाश दास का गजल संग्रह मौजूद है. खरीद कर पढ़ेंगे तो निराश नहीं होंगे. पूरा पैसा वसूल. यदि समय आपका साथ दे तो इस बार मेले में फिल्मकार अविनाश दास से मुलाकात हो जाएगी, हस्ताक्षर भी और फोटो भी आसानी से ले सकेंगे. क्योंकि फिल्म रिलीज होने पर वह सेलिब्रिटी बन चुके होंगे और अगले बरस मेले में उनकी नई किताब आने पर हमारे-आपके लिए उनके पास शायद समय कम हो.

इश्क में माटी सोना'

गांव से शहर और फिर शहर से गांव के रास्ते का सफर इतना आसान भी नहीं जितना दिखता है. यदि यह आसान होता तो गांव और शहर के बीच की दूरी, चमचमाती सड़कों और मिट्टी की पगडंडियों, रंग-बिरंगी रोशनियों से भरी कॉलोनियों और लालटेन की टिमटिमाती लौ की दूरियां भी खत्म हो चुकी होती. जब पिछले सात-आठ दशक से हर शख्स गांव के विकास की बात करता हो लेकिन विकास कोसों दूर हो मानो यह गिरीन्द्र नाथ झा की 'इश्क में माटी सोना' न होकर मुसहर जाति की 'रूपा' और राय टोले के 'उमेश' की बात हो. 
लघु प्रेम कहानी यानी लप्रेक के जरिए जिन छोटी प्रेम कहानियों को पत्रकार रवीश कुमार ने नींव रखी, उसे नए धरातल और नए सिरे से गिरीन्द्र ने लोगों के सामने रखा है. इनकी कहानी सिर्फ प्रेम कहानी भर नहीं है बल्कि एक ऐसे पत्रकार की भी कहानी है जिसने दिल्ली आकर कई सपने संजोए थे लेकिन उन सपनों की मंजिल आर्थिक तौर पर पिछड़े जिले पूर्णिया का एक गांव चनका तो था, लेकिन प्रेम, अनुभव और चिंतन के तौर पर बौद्धिक विकास की सीमाओं से परे था.
कुल 86 पेज में सिमटी प्रेम कहानियां शहर के पते से निकलकर, जिंदगी और प्रेम से नज़्मे गाते हुए, धूप और छांव से गुजरते हुए जमाने की हद से उस पार ले जाता है, जिसके दायरे में दिल्ली है, दिल्ली के तमाम मुहल्ले हैं, दिल्ली की तमाम सड़कें हैं, फेसबुक के साइक्स हैं, गांव के कदम्ब के पेड़ हैं, अष्टजाम है कीर्तन हैं. फणीश्वरनाथ रेणु के बाद के दशकों से पूर्णिया, मधेपुरा, कटिहार, सहरसा, सुपौल, फारबिसगंज के इलाके की कहानी तो सामने आई पर भाषाई पटल पर वह पिछड़े ही रहे. ऐसे में गिरीन्द्र नई आशा के साथ सिर्फ दिखते ही नहीं बल्कि रचते भी हैं क्योंकि वे न सिर्फ शब्दों से खेलते हैं बल्कि नए मुहावरे गढ़ते भी हैं. गाम, नमनेसन, रूपिया, भोज, सिटकनी, अलच्छन, अखिलेसर, सुन्नैर, आलता, दसबजिया, चाह, दुआर जैसे स्थानीय लोक शब्द उनकी कहानियों को विस्तृत फलक देते हैं, वहीं हर कहानी की अलग खास लाइन आपको प्रेम में डुबकी लगाने के लिए मजबूर करते हैं. मसलन, 'हम एकांत में लिखते थे, अपने-अपने हिस्से के मन', 'उजाले में तुम्हारी आंखों का रंग बिलकुल बदल जाता है. क्या आंखों को भी धूप लग गई है', 'तुम्हारे रेणु तुम्हें कैसे लगते हैं-गुलजार के चांद की तरह', 'उसे चांद पसंद था और मुझे तारों भरा आसमान', 'इन किताबों की तमाम महफिलों में भी मुझे तुम ही दिखती हो...जैसे किसी भी गायक को सुनते हुए मेरा मन उसके संगतकार में रमा रहता है', 'काफी की झाग में जिंदगी खोज रहा हूं', 'प्यार भी चांद की कला है शायद, हर रोज नया रूप'.
अनुभव और शब्दों की जादू तमाम कहानियों में है यही कारण है कि कहानी के पात्र कहते हैं, प्रकृति तो बैकग्राउंड म्यूजिक है तुम्हारे होने की सुंदरता का, हम बिहारी लड़कों को दिल्ली में लड़कियों से जाने कितनी बातें सीखने को मिलती है, हमलोग देखते हैं सेक्युलर सपना, जंगली किसान, दिल्ली की जेब में गांव के साथ-साथ कहता है बिन बाप के घर का बड़ा बेटा बहुत जल्दी बाप बन जाता है, वगैरह.
राजकमल प्रकाशन के उपक्रम 'सार्थक' के द्वारा प्रकाशित गिरीन्द्र नाथ झा की कहानियां न सिर्फ प्रेम की गलियों में भटकने के लिए मजबूर करता है बल्कि विक्रम नायक का चित्रांकन भी बरबक्स पन्ने पलटने के लिए मजबूर करता है तभी तो मेरा चार वर्ष का बेटा विज्ञेश इस किताब को 'पढ़ता' है जिसे अभी सही तरीके से पढ़ना नहीं आता. वह तो अभी नर्सरी में ही स्कूली ज्ञान ले रहा है.
आमीन.