4/14/2016

सोशल मीडिया क्या है?

एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है
सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है, जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैं, बल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहीं, इसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्क, संवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़ने, उत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मैन्युअल कैसट्ल के मुताबिक सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों फेसबुक, ट्विटर आदि के जरिए जो संवाद करते हैं, वह मास कम्युनिकेशन न होकर मास सेल्फ कम्युनिकेशन है। मतलब हम जनसंचार तो करते हैं लेकिन जन स्व-संचार करते हैं और हमें पता नहीं होता कि हम किससे संचार कर रहे हैं। या फिर हम जो बातें लिख रहे हैं, उसे कोई पढ़ रहा या देख रहा भी होता है।
इंटरनेट ने बदली जीवनशैली
पिछले दो दशकों से इंटरनेट ने हमारी जीवनशैली को बदलकर रख दिया है और हमारी जरूरतें, कार्य प्रणालियां, अभिरुचियां और यहां तक कि हमारे सामाजिक मेल-मिलाप और संबंधों का सूत्रधार भी किसी हद तक कंप्यूटर ही है। सोशल नेटवर्किंग या सामाजिक संबंधों के ताने-बाने को रचने में कंप्यूटर की भूमिका आज भी किस हद तक है, इसे इस बात से जाना जा सकता है कि आप घर बैठे दुनिया भर के अनजान और अपरिचित लोगों से संबंध बना रहे हैं। ऐसे लोगों से आपकी गहरी छन रही है, अंतरंग संवाद हो रहे हैं, जिनसेआपकी वास्तविक जीवन में अभी मुलाकात नहीं हुई है।। इतना ही नहीं, यूजर अपने स्कूल और कॉलेज के उन पुराने दोस्तों को भी अचानक खोज निकाल रहे हैं, जो आपके साथ पढ़े, बड़े हुए और फिर धीरे-धीरे दुनिया की भीड़ में कहीं खो गए।
दरअसल, इंटरनेट पर आधारित संबंध-सूत्रों की यह अवधारणा यानी सोशल मीडिया को संवाद मंचों के तौर पर माना जा सकता है, जहां तमाम ऐसे लोग जिन्होंने वास्तविक रूप से अभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं है, एक-दूसरे से बखूबी परिचित हो चले हैं। आपसी सुख-दुख, पढ़ाई-लिखाई, मौज-मस्ती, काम-धंधे की बातें सहित सपनों की भी बातें होती हैं।
अमेरिकी की कठपुतली
दुनिया के दो अहम सोशल नेटवर्किंग साइट्स फेसबुक और ट्विटर जिसका मुख्यालय अमेरिका में है, पूरी दुनिया पर राज कर रहा है। मालूम हो कि फेसबुक की स्थापना 2004 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्रों ने की थी। शुरुआत में इसका नाम फेशमाश था और जुकेरबर्ग ने इसकी स्थापना विश्वविद्यालय के सुरक्षित कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करके किया था। हार्वर्ड विवि में उन दिनों छात्रों के बारे में बुनियादी सूचनाएं और फोटो देने वाली अलग से कोई डायरेक्ट्री नहीं थी। कुछ ही घंटों के भीतर जुकेरबर्ग का प्रयोग लोकप्रिय हो गया लेकिन विवि प्रशासन ने इस पर गहरी आपत्ति जताई और जुकेरबर्ग को विवि से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उसके बाद फेसबुक ने क्या मुकाम हासिल किया, यह किसी से छुपी हुई नहीं है।
नेटवर्किंग की प्रसिद्ध कंपनी सिस्को ने दुनिया के 18 देशों में कॉलेज जाने वाले युवाओं में इस बात को लेकर कुछ वर्ष पहले एक अध्ययन किया था कि वे अपने संभावित कार्यालय में क्या-क्या चाहते हैं। भारत में 81 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे लैपटॉप, टैबलेट या स्मार्टफोन के जरिए ही काम करना पसंद करेंगे। 56 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे ऐसी कंपनी में काम करना पसंद करेंगे, जहां सोशल मीडिया या मोबाइल फोन पर पाबंदी हो।
वहीं, ट्विटर इस दुनिया में 21 मार्च, 2006 को आया और तक से लेकर आज तक यह नित्य नई बुलंदियों को छू रहा है। पहले ट्विटर को केवल कंप्यूटर में प्रयोग किया जा सकता था लेकिन अब यह टैबलेट, स्मार्टफोन आदि में भी डाउनलोड किया जा सकता है। ट्विटर पर अभी तक सिर्फ 140 शब्दों में लिखने की सुविधा थी लेकिन पिछले दिनों इस पर लिखने की शब्दसीमा को बढ़ाया गया है। मालूम हो कि ट्विटर के लिए अभी तक सत्तर हजार से भी अधिक प्लेटफार्म पर अलग-अलग एप्लीकेशनें बन चुकी हैं।
कहां तक है सोशल मीडिया का दायरा
2011 में अरब में हुए आंदोलन में मीडिया खासकर इंटरनेट, मोबाइल तकनीक के अलावा फेसबुक और ट्विटर ने अहम भूमिका निभाई। लीबिया और सीरिया में भी यही हाल रहा। इन आंदोलनों के बाद इंटरनेट सेंसरशिप की प्रवृति जिस कदर बढ़ी है, वह शायद ही कभी देखने को मिली। इसके पक्ष में भले ही बहस की जाती रही लेकिन हकीकत यह है कि अलग-अलग देशों में सेंसरशिप अपने विभिन्न अवतारों में मौजूद है। इंटरनेट पर नियंत्रण करने के लिए कहीं इंटरनेट को ब्लॉक किया गया तो कहीं कॉपीराइट, मानहानि, उत्पीड़न और अवमानना को हथियार बनाया जा रहा है।
भारत के गुजरात में जहां हार्दिक पटेल के आंदोलन को देखते हुए इंटरनेट को बंद कर दिया गया था, वहीं मुंबई में बाला साहेब ठाकरे के निधन पर महाराष्ट्र की एक लड़की के कमेंट और उसकी सहेली के उस कमेंट को लाइक करने का खामियाजा किस तरह भुगतना पड़ा, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, पिछले दिनों सरकार ने व्हाट्सएप के संदेशों में लोगों को नब्बे दिनों तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया लेकिन मामले के सामने आ जाने और विरोध के कारण केंद्र सरकार को इस प्रस्ताव को तुरंत वापस लेना पड़ा।
हो रही निगरानी
वहीं, अमेरिका में इंटरनेट को सेंसर करने के लिए अमेरिकी कांग्रेस के सामने कुछ वर्ष पहले ‘सोपा’ और ‘पीपा’ नामक विधेयक लाया गया था और इसके विरोध स्वरूप अंग्रेजी विकिपीडिया कुछ वक्त के लिए गुल की गई थी। इंटरनेट पर निगरानी रख रही संस्थानों का दावा है कि सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूर्व एशिया, मध्य एशिया और मध्यपूर्व और उत्तरी अफ्रीका ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सरकार द्वारा इंटरनेट को सख्त किया जा रहा है। 2010 में ओपन नेट इनिशियेटिव ने विश्व के कुल 40 देशों की लिस्ट जारी की थी, जहां की सरकारें इंटरनेट फिल्टिरिंग कर रही हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने इंटरनेट स्वतंत्रता संबंधी प्रस्ताव पांच जुलाई 2012 को पारित कर दिया था और परिषद ने सभी देशों से नागरिकों की इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को समर्थन देने की अपील की थी।
अंकुश लगाने की प्रक्रिया जारी
एक ओर जहां अभिव्यक्ति के तमाम विकल्प सामने आ रहे हैं, वहीं इस पर अंकुश लगाने की प्रक्रिया भी पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां कहीं भी सरकार को आंदोलन का धुआं उठता दिखाई देता है, तुरंत सरकार की नजर सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर जाती है और सीधे तौर पर अंकुश लगाने से नहीं हिचकती। गौरतलब है कि ये सोशल मीडिया के प्लेटफार्म सिर्फ व्यक्तिगत जानकारियों के लिए ही प्रयोग में नहीं लाए जाते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मामलों में में लोगों की रुचि का भी काम करता है। याद करें देश की राजधानी दिल्ली में 2012 में हुए गैंग रेप को कि कैसे लोग दोषियों को सजा दिलाने के लिए एकजुट होकर उठ खड़े हुए थे। इन साइटों पर रेप, मर्डर, गर्ल एजुकेशन जैसे पेज प्रमुख थे। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर उठी नफरत की आंधी बेलगाम सोशल मीडिया का नतीजा था और इसका पूरा प्रभाव पूरे देश में देखने को मिला था।
सभी ने मन लोहा
इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में इसकी पूरी ताकत देखने को मिली। हालांकि अमेरिका में बराक ओबामा ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स की ताकत का लोहा पहले ही दिखा चुके थे। भारत में नरेंद्र मोदी ने इसका भरपूर उपयोग किया और इसका फायदा भाजपा को भी मिला। नरेंद्र मोदी भले ही पूरे चार सौ से अधिक संसदीय क्षेत्र का दौरा किया लेकिन उन्होंने फेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब के जरिए जिस तरह लोकप्रियता हासिल की, वह एक नया इतिहास है। लोग उनके फेसबुक पर पोस्ट की गई बातों और तस्वीरों को पोस्ट करते, प्रतिक्रिया देता और उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगाते। वहीं, दूसरी ओर, उनके तमाम प्रतिद्वंद्वी उनकी रणनीति की कोट पूरे चुनावी समर में सामने नहीं ला पाए और जाहिर सी बात है कि वे चारों खाने चित्त गिरे।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )

खबरों का खेल बनाम एजेंडा सेटिंग

मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता हैमीडिया एजेंडाजो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीति काफी हद तक मीडिया को प्रभावित करती है। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को तवज्जो देता हैकिस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है और ऑडियंस की रुचि कैसी खबरों में हैआदि बातें मायने रखती हैं और फिर खबरों के प्रसारण के बाद उन्हीं बातों पर आम लोग अपनी राय कायम करते हैं।(मैक्सवेल)
खबरों के शतरंजी खेल में कौन ‘राजा” है और कौन ‘प्यादा”, दर्शकों और पाठकों के लिए इसे समझना काफी मुश्किल है। हालांकि वे अपनी राय खबरिया चैनलों पर दिखाई जा रही खबरों और अखबारों में छपे मोटे-मोटे अक्षरों के हेडलाइंस को पढ़कर ही बनाती है और लगातार उन मुद्दों पर विचार-विमर्श भी करती है। यही वह विंदु होता है जहां से मीडिया की एजेंडा सेटिंग का प्रभाव पड़ना शुरू होता है। मीडिया की एजेंडा सेटिंग थ्योरी कहती है कि मीडिया कुछ घटनाओं या मुद्दों को कमोबेश कवरेज देकर राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक बहसों या चर्चाओं का एजेंडा तय करता है। आज खबरिया चैनलों पर प्राइम टाइम की खबरें देंखें तो यह एजेंडा सेटिंग पूरी तरह साफ-साफ समझ में आती है। इस प्राइम टाइम पर सिर्फ खबरें ही नहीं दिखाई जाती बल्कि जोरदार चर्चा के साथ बहस भी की जाती है। चाहे ईपीएफ पर कर लगाने की बात हो या फिर जेएनयू के छात्रों पर मुकदमा दर्ज करने का मामला।
अन्ना आंदोलन के दौरान लोकपाल मामले में संसद में बहस के दौरान शरद यादव ने युवा सांसदों से सवाल किया था कि आप लोग बुद्धू बक्से में बहस के लिए क्यों जाते हैं। वह पिछले दस सालों से वहां बहस करने के लिए नहीं जाते हैं। तो उन्होंने जाने-अनजाने जिस मुद्दे की ओर पूरा देश का ध्यान आकर्षित किया था, उसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने इसी मीडिया एजेंडा थ्योरी की ओर ही ध्यान आकर्षित कराया था। इस थ्योरी को सरकार के साथ-साथ राजनीतिक दल और कॉरपोरेट समूह बखूबी समझते हैं क्योंकि इसका आकलन इस बात से किया जा सकता है कि जब भर किसी गंभीर मसला सामने आता है तो विभिन्न राजनीतिक पार्टियां, सरकार और कॉरपोरेट समूह के तेजतर्रार प्रवक्ता इस पर चर्चा कर रहे होते हैं और अपने हिसाब से एजेंडे का मुंह मोड़ते रहते हैं।
आज पाठक या दर्शक ही मीडिया का प्रोडक्ट हो चुका है। जाहिर-सी बात है कि हर प्रोडक्ट को एक बाजार की जरूरत होती है और मीडिया का बाजार और खरीदार का रास्ता विज्ञापन से होकर विज्ञापन तक जाता है। यानी मीडिया का बाजार उसका विज्ञापनदाता है। इस मसले को अमेरिका के संदर्भ में नोम चोमस्की अच्छी तरह समझाते हैं। वे लिखते हैं कि वास्तविक मास मीडिया लोगों को डायवर्ट कर रही है। वे प्रोफेशनल स्पोट्र्स, सेक्स स्कैंडल या फिर बड़े लोगों के व्यक्तिगत बातों को जमकर सामने रखती हैं। क्या इससे इतर और कोई गंभीर मामले ही नहीं होते। जितने बड़े मीडिया घराने हैं वे एजेंडे को सेट करने में लगे हुए हैं। अमेरिका के न्यूयार्क टाइम्स और सीबीएस ऐसे मामलों के बादशाह हैं। उनका कहना है कि अधिकतर मीडिया इसी सिस्टम से जुड़े हुए हैं। संस्थानिक ढांचा भी कमोबेश उसी तरह का है। न्यूयार्क टाइम्स एक कॉरपोरेशन है और वह अपने प्रोडक्ट को बेचता है। उसका प्रोडक्ट ऑडियंस है। वे अखबार बेचकर पैसे नहीं बनाते। वे वेबसाइट के जरिए खबरें पेश करके खुश हैं। वास्तव में जब आप उनके अखबार खरीदते हैं तो वे पैसे खर्च कर रहे होते हैं। लेकिन चूंकि ऑडियंस एक प्रोडक्ट है, इसलिए लोगों के लिए उन लोगों से लिखाया जाता है तो समाज के टॉप लेवल नियतिनियंता हैं। आपको अपने उत्पाद को बेचने के लिए बाजार चाहिए और बाजार आपका विज्ञापनदाता है। चाहे टेलीविजन हो या अखबार या और कुछ आप ऑडियंस को बेच रहे होते हैं। (नोम चोमस्की)
यही कारण है कि भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर जब ‘टाइम” मैग्जीन ने कवर स्टोरी छापी और ‘वाशिंगटन पोस्ट” ने लिखा तो भारत सरकार की नींद हराम हो गई। यह मीडिया एजेंडा का ही प्रभाव था कि वैश्विक स्तर पर अपनी साख को बचाने के लिए भारत की कांग्रेस सरकार ने आनन-फानन में कई फैसले लिए। क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि 1990 के दशक में जब मनमोहन सिंह भारत के वित्तमंत्री थे तो उन्होंने आर्थिक उदारीकरण का दौर लाया था और भारत अमेरिका सहित दुनिया के आर्थिक संपन्न देशों की नजरों में छा गया। यही वह समय था जब मनमोहन सिंह उस दुनिया के चहेते बन गए लेकिन आज जब पश्चिमी मीडिया ने खिचार्इं की तो फिर उन्हें कड़े कदम उठाने के लिए मजबूर हो गए।
आज के दौर में चाहे सरकार हो या विपक्ष या फिर सिविल सोसाइटी के सदस्य, हर कोई एजेंडा सेट करने में लगा है। देशद्रोह, जेएनयू, अख़लाक़, कन्हैया, रोहित बेमुला, लोकपाल, भ्रष्टाचार, आंदोलन, चुनाव, विदेशी मीडिया, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, टूजी एस्पेक्ट्रम मामला, कोयला आवंटन मामले आदि ऐसे मामले हैं जिनके जरिए विभिन्न रूपों में एजेंडे तय किए गए। क्योंकि हर मामले में चाहे न्यूज चैनल हो या फिर अखबार, हर जगहों पर जमकर बहस हुई और मीडिया की नई भूमिका लोगों ने देखा कि किस तरह आरोपी और आरोप लगाने वाले एक ही मंच पर अपनी-अपनी सफाई दे रहे हैं।
यहीं से मामला गंभीर होता जाता है कि क्या मीडिया की भूमिका एजेंडा सेट करने के लिए होती है। अभी अधिक समय नहीं बीता जब ‘पेड न्यूज” को लेकर संसद तक में हंगामा मचा था। मीडिया के पर्दे के पीछे पेड न्यूज ने किस तरह का खेल खेल रही थी, यह किसी से छुपा हुआ नहीं है। लेकिन मीडिया एजेंडा सेटिंग की ओर शायद ही किसी का ध्यान गया हो। यह मामला पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के समय में सामने आया और इस थ्योरी को लेकर पहली बार मैक्सवेल मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ ने लिखा। 1922 में पहली बार वाल्टर लिप्पमेन ने इस मामले में अपनी बात सामने रखी थी। उनके मुताबिक लोग किसी भी मामले में सीधे तौर पर अपनी प्रतिक्रिया नहीं देते बल्कि वे स्यूडो वातावरण में रहते हैं। ऐसे में मीडिया उनके लिए काफी मायने रखता है क्योंकि यह उनके विचारों को प्रभावित करता है। (वाल्टर लिप्पमेन) मालूम हो कि मैक्सवेल मैकॉम्ब और शॉ के द्वारा एजेंडा सेटिंग थ्योरी सामने रखने के बाद इस मामले पर करीब सवा चार सौ अध्ययन हो जुके हैं। वैश्विक तौर पर भौगोलिक और एतिहासिक स्तर पर यह एजेंडा कई स्वरूपों में सामने आया बावजूद इसके दुनिया में तमाम तरह के मसले हैं और तमाम तरह की खबरें भी हैं।
अभी तक एजेंडा सेटिंग के गिरफ्त में विदेशी चैनलों और अखबारों के शामिल होने की खबरें सामने आती थीं लेकिन अब भारतीय मीडिया पूरी तरह इसकी चपेट में है। अखबारों की हेडलाइंस के आकार, खबरों का आकार और प्लेसमेंट मीडिया एजेंडा का कारक होता है तो वहीं टीवी चैनलों में खबरों के पोजिशन और लंबाई उसकी प्राथमिकता और महत्ता को तय करती है। इस मामले में आनंद प्रधान लिखते हैं कि कहने को इन दैनिक चर्चाओं में उस दिन के सबसे महत्वपूर्ण खबर या घटनाक्रम पर चर्चा होती है लेकिन आमतौर पर यह चैनल की पसंद होती है कि वह किस विषय पर प्राइम टाइम चर्चा करना चाहता है। वह कहते हैं कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोकतंत्र में ये चर्चाएं कई कारणों से महत्वपूर्ण होती हैं। ये चर्चाएं न सिर्फ दर्शकों को घटनाओं व मुद्दों के बारे में जागरूक करती हैं और जनमत तैयार करती हैं बल्कि लोकतंत्र में वाद-संवाद और विचार-विमर्श के लिए मंच मुहैया कराती हैं। वह आगे लिखते हैं कि न्यूज मीडिया इन चर्चाओं और बहसों के जरिये ही कुछ घटनाओं और मुद्दों को आगे बढ़ाते हैं और उन्हें राष्ट्रीय/क्षेत्रीय एजेंडे पर स्थापित करने की कोशिश करते हैं।(आनंद प्रधान) हालांकि एजेंडे का प्रभाव तत्काल दिखाई नहीं देता, इसका प्रभाव दूरगामी भी होता है। वालग्रेव और वॉन एलिस्ट कहते हैं कि एजेंडा सेटिंग का यह मतलब नहीं होता है कि उसके प्रभाव स्पष्ट दीखने लगें बल्कि यह टॉपिक, मीडिया के प्रकार आैर इसके विस्तार के सही समुच्चय के तौर पर सामने आता है। (वालग्रेव एंड वॉन एलिस्ट, 2006)
वर्तमान में भारतीय न्यूज़ चैनलों की खबरों का विश्लेषण करें तो मैक्सवेल ई मैकॉम्ब और डोनाल्ड शॉ द्वारा जनसंचार के एजेंडा सेटिंग थ्योरी के निष्कर्ष साफ दिखाई देंगे। पिछले कुछ समय से जो खबरें प्रसारित की जा रही हैं उनके जरिए न्यायपालिका से लेकर संसदीय प्रक्रिया तक के एजेंडे तय हुए हैं। सबसे ताजातरीन मामला आरुषि हत्याकांड का है। आज के दौर में ऐसा लगता है हमारा पूरा का पूरा मीडिया एजेंडा सेटिंग के सिद्धांत में उलझकर रह गया है। ट्रायल और ट्रीब्यूनल्स को किस तरह भारतीय मीडिया पेश करते हैं, यह किसी से छुपी हुई नहीं है। इतना ही नहीं, एजेंडा सेटिंग कई तरह के प्रभाव से भी जुड़े होते हैं मसलन फायदेमंद प्रभाव, खबरों को नजरअंदाज करना, खबरों के प्रकार और मीडिया गेटकीपिंग आदि। (डेयरिंग एंड रोजर्स, 1996:15)
पिछले दिनों एक साक्षात्कार में शेखर गुप्ता मीडिया एजेंडा थ्योरी की बारीकियों को बताते हुए कहा था कि मीडिया का मूल सवाल खड़े करना है लेकिन यह एजेंडा तब हो जाता है जब आप सवाल के जरिए किसी एजेंडे को खड़े करते हैं। इन मसलों पर अब विचार नहीं किया जाता। मसलन भ्रष्टाचार के विरोध में खड़ा हुआ आंदोलन मीडिया को और व्यापक बनाते हैं। यदि मीडिया अच्छे कारणों को लेकर चल रही है और इससे समाज को बड़े पैमाने पर फायदा होगा तो इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जेंडर की समानता को लेकर चलाया गया कंपेन काफी प्रभावशाली रहा था और ‘गुड एजेंडा सेटिंग” का उदाहरण है। साक्षरता, सूचना अधिकार आदि को लेकर चलाया गया कंपेन भी इसी का उदाहरण है। (शेखर गुप्ता)
इसी मसले पर सेवंती नैनन का मानना है कि मीडिया में इतनी ताकत होती है कि वह किसी भी मसले को हमारे दिमाग में भर दे। जैसे अन्ना आंदोलन को लेकर जो नॉन स्टॉफ कवरेज टीवी चैनलों के द्वारा किया गया, इससे हर कोई यह सोचने के लिए विवश हो गया कि कौन-सा राष्ट्रीय मसला महत्वपूर्ण है। जहां तक इसके नकारात्मक पहलू की बात है तो हर किसी को चोर कह देना आैर जेल में डालने की बात कहना, गलता है। ऐसे में यह ध्यान देना चाहिए कि सब कुछ टीआरपी ही नहीं होता। (सेवंती नैनन) गौरतलब है कि वरिष्ठ पत्रकार एन. राम ने सकारात्मक पक्ष को एजेंडा बिल्डिंग का नाम दिया है और उनका कहना है लोगों को एजेंडा सेटिंग और प्रोपगैंडा के साथ एजेंडा बिल्डिंग के बीच कनफ्यूज नहीं होनी चाहिए।
मालूम हो कि एजेंडा सेटिंग तीन तरीके से होता है, मीडिया एजेंडा, जो मीडिया बहस करता है। दूसरा पब्लिक एजेंडा जिसे व्यक्तिगत तौर पर लोग बातचीत करते हैं और तीसरा पॉलिसी एजेंडा जिसे लेकर पॉलिसी बनाने वाले विचार करते हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि राजनीति काफी हद तक मीडिया को प्रभावित करती है। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को तवज्जो देता है, किस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है और ऑडियंस की रुचि कैसी खबरों में है, आदि बातें मायने रखती हैं और फिर खबरों के प्रसारण के बाद उन्हीं बातों पर आम लोग अपनी राय कायम करते हैं।(मैक्सवेल)
आखिर किस तरह की खबरें दिखाई जा रही हैं और किस तरह के विज्ञापन प्रसारित किए जा रहे हैं, इनकी निगरानी करने वाली संस्थाएं कहां हैं। शुरुआती दौर में एजेंडा सेटिंग के तहत समाचारों का विश्लेषण पब्लिक ओपेनियन पोलिंग डाटा के साथ किया जाता था और राजनीतिक चुनाव के दौरान इसकी मदद से काफी कुछ तय हो जाता है। यही कारण है कि नोम चोमस्की कहते हैं कि इन मामलों में पीआर रिलेशन इंडस्ट्री, पब्लिक इंटलेक्चुअल, बिग थिंकर (जो ओप एड पेज पर छपते हैं) की भूमिका पर ध्यान देना होगा। हालांकि समय के साथ मीडिया के एजेंडे में बदलाव होता रहता है और ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि एक बात तय होती है कि पत्रकारों की सहभागिता के साथ-साथ आम लोग किसी खास मुद्दे पर बात करते हैं और बहस करते हैं।
नोम चोमस्की कहते हैं कि मीडिया की जो भी कंपनियां है, सभी बड़ी कंपनियां हैं और मुनाफे की मलाई काटते हैं। उनका मानना है कि निजी अर्थव्यवस्था की शीर्षस्थ सत्ता संरचना का हिस्सा होती हैं और ये मीडिया कंपनियां मुख्य तौर पर ऊपर बैठे बड़े लोगों द्वारा नियंत्रित होती हैं। अगर आप उन आकाओं के मुताबिक काम नहीं करेंगे, तो आपको नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है। बड़ी मीडिया कंपनियां इसी आका तंत्र का एक हिस्सा है। (नोम चोमस्की) ऐसे में हमें विभिन्न एजेंडों, मीडिया की प्राथमिकता, आम लोगों और कानूनविदों के बीच अंतर को समझना होगा। किस तरह की खबरों को प्रमोट किया जाता है और किस तरह खबरों से खेला जा रहा है, वह भी एजेंडा सेटिंग में मायने रखते हैं। जैसे मीडिया कभी घरेलू मामलों को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय मामलों को तवज्जो देने लगता है या फिर घरेलू मसलों में से किसी खास मसले की खबरें लगातार दिखाई जाती हैं। (रोजर्स एंड डेयरिंग, 1987)
बहरहाल, लोकतंत्र के इस लोक में मीडिया पर बाजार का जबर्दस्त प्रभाव है क्योंकि पेड न्यूज तो पैसे कमाने का साधन मात्र था लेकिन मीडिया एजेंडा तो पूरे तंत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसके दायरे में सिर्फ आर्थिक संसाधन नहीं आते बल्कि पूरे लोक की सोच और समझ के साथ नियति निर्धारकों का मंतव्य भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में जाहिर सी बात है कि मीडिया एजेंडे थ्योरी को समझना होगा और इसके जरिए पड़ने वाले प्रभाव पर भी बारीक नजर रखनी होगी।
संदर्भ:
नोम चोमस्की, 1997, http://www.chomsky.info/articles/199710–.htm
वाल्टर लिप्पमेन,http://www.agendasetting.com/index.php/agenda-setting-theory
आनंद प्रधान, 2011, http://www.tehelkahindi.com/stambh/diggajdeergha/forum/994.html
शेखर गुप्ता, 2011, http://www.campaignindia.in/Article/276406,double-standards-why-is-agenda-setting-in-media-significant.aspx
सेवंती नैनन, 2011, http://www.campaignindia.in/Article/276406,double-standards-why-is-agenda-setting-in-media-significant.aspx
डेनिस मैक्वेल, 2010, McQuail’s Mass Communication (6th ed.) Theory, pp. 513-514, Sage Publication
रोजर्स एंड डेयरिंग, 1987, ‘Agenda setting research; Where has it been? Where is it going?, in J. Anderson (ed.) Communication Yearbook 11, pp.555-94, Newbury Park. CA: Sage.’
वालग्रेव एंड वान एलिस्ट, 2006, ‘The contingency effect of the mass media’s agenda setting’, Journal of Communication, 56(1), pp. 88-109′
डेयरिंग एंड रोजर्स, 1996, Agenda Setting Thousand Oaks, CS: Sage

(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से सोशल मीडिया पर शोध कर रहे हैं. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )

3/29/2016

न्यूज़ ब्रेक करता है सोशल मीडिया

किसी भी घटना की पहली रिपोर्ट जो पुलिस दर्ज करती है, वह एफआईआर यानी फस्र्ट इनफार्मेशन रिपोर्ट कहलाती है। इस रिपोर्ट में किसी भी घटना की बारीक जानकारी होती है, जो प्रभावित व्यक्ति दर्ज कराता है। उसी तरह वर्तमान समय में सोशल मीडिया तमाम मुख्यधारा की मीडिया के लिए एफआईआर का काम करती है और आज फेसबुक के पोस्ट, स्टेट्स और ट्विटर की ट्वीट से खबरें ब्रेक होने लगी है और बनने लगी है। पहली खबर सोशल मीडिया में फ्लैश होते ही उसे लेकर रिपोर्टर रिसर्च करता है, छानबीन करता है, संबद्ध लोगों से बातचीत करता है और फिर पुख्ता खबर अखबारों में जहां प्रकाशित होता है, वहीं न्यूज चैनलों पर प्रसारित होता है।
त्रासदियों को करें याद
याद करें उत्तराखंड में आई भीषण त्रासदी को, या फिर नेपाल और बिहार में आए भूकंप को, तमाम अखबार और न्यूज चैनलों ने खबरें जानने और प्रसारण करने के लिए इन्हीं सोशल मीडिया का सहारा लिया। यहां तक कि मीडिया के इन माध्यमों में जो तस्वीरें या वीडियो दिखाए गए, वे इन्हीं सोशल मीडिया से लिए गए थे। अब तो प्रधानमंत्रियों सहित केंद्र सरकार के तमाम मंत्री प्रेस कांफ्रेस करना तक भूल गए हैं और वे लोगों को तमाम जानकारी सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्म के जरिए दे रहे हैं। गौरतलब है कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने विदेशी प्रवास पर किसी मीडियाकर्मी को नहीं ले जाते लेकिन उनके फेसबुक और ट्विटर एकाउंट पर दी गई जानकारी और फोटो सुर्खियां बनती हैं।
नोकझोंक बनती हैं सुर्खियां
यह सिर्फ केंद्र सरकार की कार्य पद्धति नहीं है बल्कि राज्यों में पक्ष और विपक्षी नेताओं की नोकझोंक भी इन्हीं सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर चलती रहती है। यहां तक कि किसी खिलाड़ी के मैच या पदक जीतने पर तमाम नेता सोशल मीडिया के माध्यमों से बधाई देते हैं और वे तमाम मीडिया में सुर्खियां पाती हैं। किसी फिल्म का फस्र्ट लुक भी अब इन्हीं सोशल मीडिया में पहली बार आता है। फिल्म अभिनेता और निर्माता अपनी फिल्मी का प्रचार-प्रसार के लिए इन्हीं माध्यमों का सहारा लेते हैं। इसके अलावा, अपनी व्यक्तिगत जानकारियां और तस्वीरें भी यहां पोस्ट करते हैं। इतना ही नहीं, किसी अखबार में उनके बारे में या फिर कोई और जानकारी प्रकाशित होने पर वे विरोध भी दर्ज कराते हैं। मसलन दीपिका पादुकोण और उनके अंगों को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित खबरों को लेकर दीपिका पादुकोण ने कैसी प्रतिक्रिया जाहिर की थी और सोशल मीडिया पर कैसी लताड़ लगाई थी, यह किसी से छुपी हुई नहीं थी। वहीं, दीपिका की फिल्म ‘माई च्वाइस’ का यूट्यूब पर प्रसारण और फिर इसके बाद सामाजिक परिदृश्य में पक्ष और विपक्ष में बहस ज्यादा पुरानी नहीं है।
(पूरा आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें http://www.newswriters.in/2016/03/29/breaking-news-on-social-media/)

2/07/2016

संचार के पारंपरिक दुर्ग में सेंध

सोशल मीडिया/ विनीत उत्पल

सोशल मीडिया एक तरह से दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे उन लोगों से संवाद है जिनके पास इंटरनेट की सुविधा है। इसके जरिए ऐसा औजार पूरी दुनिया के लोगों के हाथ लगा है,जिसके जरिए वे न सिर्फ अपनी बातों को दुनिया के सामने रखते हैंबल्कि वे दूसरी की बातों सहित दुनिया की तमाम घटनाओं से अवगत भी होते हैं। यहां तक कि सेल्फी सहित तमाम घटनाओं की तस्वीरें भी लोगों के साथ शेयर करते हैं। इतना ही नहींइसके जरिए यूजर हजारों हजार लोगों तक अपनी बात महज एक क्लिक की सहायता से पहुंचा सकता है। अब तो सोशल मीडिया सामान्य संपर्कसंवाद या मनोरंजन से इतर नौकरी आदि ढूंढ़नेउत्पादों या लेखन के प्रचार-प्रसार में भी सहायता करता है।
साझी चेतना पैदा करता है सोशल मीडिया
न्यूयार्क विश्वविद्यालय में न्यू मीडिया के प्रोफेसर क्ले शर्की का मत है कि सोशल मीडिया की सबसे बड़ी क्रांति शक्ति यह यह है कि यह जनता के यथार्थ और निजी जिंदगी में साझी चेतना पैदा करता है। स्टेट के पास निगरानी के चाहे कितने भी संवेदनशील उपकरण हों लेकिन अब राज्य का सामान्य नागरिक भी अपने संसाधनों का प्रयोग स्टेट के विरुद्ध कर सकता है। वहींजेसन एबट ने अपने शोधपत्र में यह स्थापित किया है कि सोशल नेटवर्किंग साइट और नवीन तकनीकी कम्युनिकेशन का केवल नया रूप मात्र नहीं है अपितु एक्टिविस्टनागरिकों और सामाजिक आंदोलनों को जन-जन तक पहुंचाने का अद्भुत अवसर उपलब्ध कराता है।
अब प्रेस कांफ्रेंस से दूरी
इस माध्यम का सकारात्मक पहलू यह है कि अब भारत जैसे देश में प्रधानमंत्री सहित तमाम केंद्रीय नेता या अफसर मीडिया को संबोधित करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस न कर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। चुनाव लड़ने में और अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कहने में ये माध्यम काम आते हैं। पार्टी जनता से पूछती है कि सरकार बनाए या नहीं। सोशल मीडिया की ताकत का ही परिणाम है कि विश्वभर में राजनीतिक नसीब लिखने के लिए इसका सहारा लिया जाता है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार प्रजातंत्र की परिभाषा जमीन पर दिखाई दी क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने बहुतम ने मिलने पर कांग्रेस का समर्थन को स्वीकार करने के लिए जनता के निर्णय को जानने के लिए सोशल मीडियाइंटरनेट और एसएमएस का सहारा लिया तो सोशल मीडिया का लोकतंत्र में अनोखा प्रयोग था। हालांकि इसके कई नकारात्मक पहलू भी हैंमसलन प्राइवेसी। या फिर किसी के खिलाफ प्रोपेगैंड फैलाना या फिर गलत सूचनाओं का प्रसार। कुछ लोग इसका बेजा फायदा भी उठाते हैं।
हर हाथ में मीडिया
इंटरनेट की यह सुविधा कंप्यूटरलैपटॉपस्मार्टफोन में से किसी भी उपकरण के जरिए ली जा सकती है। जीमेलयाहूरेडिफ जैसी परंपरागत ई-मेल सुविधा प्रदाता वेबसाइटों के साथ-साथ इस नेटवर्किंग में बड़ी भूमिका फेसबुकट्विटरमाई स्पेस जैसी साइटों की हैजिन्हें सोशल नेटवर्किंग साइट कहा जाता है। यूजर इन प्लेटफार्म पर अपना प्रोफाइल बनाकर अपने मित्रों और संबंधियों से संपर्क कर सकता है और नए लोगों से परिचय भी कर सकता है।
सिर्फ सोलह साल में बदला संचार
सोशल मीडिया के आने की क्रांति महज एक-डेढ़ दशक पुरानी है। सारा मामला 2000 के बाद यानी इक्कीसवीं सदी का है। शुरुआती सोशल नेटवर्किंग साइट फ्रेंडस्टर 2002 में आई थी और ट्राइब 2003 में शुरू हुई। लिंक्डइन और माइस्पेस 2003 में आई और माइस्पेस इस लिहाज से सफल पहल कहा जा सकता है। फेसबुक की शुरुआत फरवरी 2004 में हुई और इसने क्रांति कर दी। जुलाई 2010 में इसके पंजीकृत यूजर 50 करोड़ हो गए। जीमेल ने बहुप्रचारित गूगल बज’ सेवा फरवरी  2010 में शुरू हुई जबकि निंग भी 2004 से काम कर रही है। हालांकि सोशल मीडिया का असली खेल 2005 से शुरू हुआ और वर्ष 2008आते-आते अमेरिका में 35 फीसदी वयस्क इंटरनेट यूजर किसी न किसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी प्रोफाइल बना ली और 18-24 साल आयुवर्ग में तो यह आंकड़ा 75 फीसदी तक पहुंच गया। ट्विटर ने अपने शुरुआती पांच साल में ही बीस करोड़ से अधिक यूजर को जोड़ा।
सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों
सोशल मीडिया जिस तरह युवाओं को खासकर लुभा रहा हैऐसे में जाहिर सी बातें हैं कि उसका एक ओर सदुपयोग हो रह है तो दूसरी ओर उसका दुरुपयोग भी। आज सिर्फ अपने नेटवर्क को स्थापित करने के लिए लोग इसका इस्तेमाल नहीं कर रहे बल्कि अपनी बातों को रखनेसमर्थन या प्रतिरोध के तौर पर भी कर रहे हैं। इसके जरिए लेखन का विस्तार,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पाठकों की प्रतिक्रिया भी सामने आती है और पक्ष या विपक्ष के विचार भी सामने आते हैं। वहींअपनी बात कहने के लिए ना तो किसी धन या संसाधन की जरूरत हैन ही स्थापित एवं औपचारिक मीडिया संस्थानों की चिरौरी करने की। किसी भी द्वंदात्मक प्रजातंत्र में मुद्दे पहचाननाउन पर जन-मानस को शिक्षित करना और इस प्रक्रिया से उभरे जन-भावना के मार्फत सिस्टम पर दबाव डालना प्रजातंत्र की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है।
संवाद का नया विकल्प
एक ओर जब मुख्यधारा की मीडिया की विश्वसनीयता हर रोज कटघरे में खड़ी होती हैवैसी परिस्थिति में सोशल मीडिया आम जनमानस के लिए संवाद के नए विकल्प के तौर पर सामने आया है। यही कारण है कि न सिर्फ नेता बल्कि अब तो अभिनेता भी अपनी खुद की जानकारीअपनी फिल्मों की जानकारी भी सोशल मीडिया के माध्यम से देने लगे हैं। फिल्म के टीजर से लेकर फस्र्ट लुक तक पहले सोशल मीडिया में आते हैं,बाद में संचार के दूसरे माध्यमों में प्रकाशित और प्रसारित होते हैं।
अनगिनत सूचनाओं का प्रवाह
अब तो लोग अपने जन्मदिन से लेकर मृत्यु और यहां तक की शादी की जानकारी भी इन्हीं सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर उपलब्ध कराते हैं। यह जानकारी सिर्फ आमलोग ही नहीं देते बल्कि समाज में एक मुकाम हासिल करने वाले लोग भी देते हैं। मसलन पिछले दिनों मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की शादी अमृता राय के साथ होने के बाद अमृता राय ने अपने फेसबुक एकाउंट के जरिए इस बात की जानकारी दी। उन्होंने अपने पोस्ट में साफ-साफ लिखा कि हिंदू रीति-रिवाजों के साथ दिग्विजय सिंह से शादी कर ली। इतना ही नहींसोशल मीडिया के जरिए उन्होंने अपने आलोचकों को भी लताड़ा और कहा कि जिन्हें प्यार के बारे में कुछ पता नहीं उन्होंने सोशल मीडिया पर मुझे शर्मशार करने का प्रयास किया। लेकिन मैं चुप रही पर और मैंने खुद पर और अपने प्यार पर भरोसा बनाए रखा। वहींजब एम्स में पढ़ाई कर रही खुशबू ने रैगिंग से परेशान होकर खुदकुशी कर ली तो पुलिस ने उसके फेसबुक एकाउंट से लेकर व्हाट्सअप स्टेटस तक की जानकारी हासिल की और पता चला कि उसने कुछ ही दिन पहले लिखा था जिंदगी कई परेशानी दिखाती है लेकिन मौत उसका हल नहीं।
हैकर्स से परेशानी
दूसरी ओर इस मीडिया के नकारात्मक पहलू भी हैं और इसके जरिए जहां एक ओर माना जाता है कि यह समय की बर्बादी करता हैवहीं भले ही यह सोशल मीडिया हो लेकिन यह बगल में बैठे लोगों से आपको दूर भी करता है। वहीं हैकर्स के कारनामों के कारण आम आदमी के साथ-साथ महानायक तक भी परेशान रहते हैं। बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन ने उन अभद्रअश्लील एसएमएस के बारे में मुंबई पुलिस से शिकायत दर्ज कराई थी,जो उन्हें पिछले वर्ष से भेजे जा रहे हैं। 72 वर्षीय अभिनेता ने जुहू पुलिस थाने के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक को संबोधित पत्र में मामले की जांच करने और दोषियों पर कार्रवाई करने का अनुरोध किया था। इससे पहले उन्होंने कहा था कि उनका ट्विटर एकाउंट हैक हो गया है और कुछ लोगों ने मुझे फॉलो करने वाले लोगों की सूची में अश्लील साइटें डाल दी हैं। जिसने भी यह किया हैमैं उसे बता देना चाहता हूं कि मुझे इसकी कोई जरूरत नहीं है।
जाहिर सी बात है कि सोशल मीडिया के पक्ष में और विपक्ष में कई बातें हैं जो रोज घट रही हैं। उनके फायदे हैं तो नुकसान भी हैं।
(लेखक एक दशक तक दैनिक भास्कर,देशबन्धुराष्ट्रीय सहारा और हिंदुस्तान जैसे अखबारों में सक्रिय पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों जामिया मिल्लिया इस्लामिया से मीडिया पर शोध कर रहे हैं. वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय नोएडा कैंपसजामिया मिल्लिया इस्लामिया के अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के रामलाल आनंद कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर अध्यापन भी किया है. )
courtesy: http://uoujournalism.blogspot.in/2016/02/blog-post_57.html

1/25/2016

जीवन कर्जा गाड़ी है

लिखने वाले लिख लेंगे तो पढ़ने वाले पढ़ लेंगे
हम अपनी औक़ात बराबर कुछ तो सीढ़ी चढ़ लेंगे
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इस दौर की सियासत पे कोई कोई नहीं लिखता
क्या इसलिए कि शायरों को मौत का डर है
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चाँद तारे झिलमिलाते हैं मगर अब भी कभी
हुस्न का हँसता हुआ चेहरा नूरानी अब कहाँ
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सारे ताकत झोंकी लेकिन बाँट नहीं पाये, अब भी
मुल्ला के घर रामलला है पंडित के घर मौला है
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गजल का फलक काफी व्यापक है.ऐसे में जब पत्रकार और फिल्मकार अविनाश दास के 88 गजलों का संग्रह ' जीवन कर्जा गाड़ी है' आया है तो जाहिर है कि इन गजलों को विभिन्न स्तरों पर जांचा-परखा जाएगा. हालांकि यह काम गजलों के व्याकरणाचार्य करेंगे लेकिन आम पाठकों को इससे क्या लेना-देना.
पाठकों को जो अच्छा लगेगा, वही पढ़ेगा चाहे तथाकथित विद्वान जो कहें. पढ़ने का यह चाव वैसा ही है जैसे फिल्म देखना. शायद ही दर्शक कभी फिल्म समीक्षक की राय और स्टार मार्क को देख फिल्म देखने जाता है. ऐसे विरोधाभाष युग में वही गजल लोगों के सिर चढ़ेगा जो आम आदमी की जबान होगी और इस बात को अविनाश बेहतर जानते हैं.
इनकी गजलों में प्रेम है, ग्रामीण स्मृतियां हैं, शहरी चौराहे हैं, आधुनिकता है और इससे बढ़कर हर शब्दों में एक अलग अपनापन है. कुल 96 पेज की इस किताब का हर पन्ना एक दस्तावेज है क्योंकि जब आप इसे पढ़ना शुरू करेंगे तो एक सांस में पूरी किताब पढ़ डालेंगे. कुछ गजल गुदगुदाएंगे तो कुछ आपके नशों में कुछ कर गुजरने का रक्तसंचार करेंगे. कुछ ललकारेंगे तो कुछ सुर-ताल में सजाने के लिए आपको मजबूर करेंगे.
मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर और अाने वाली फिल्म 'अनारकली आरावाली' के निर्देशक अविनाश जी का यह संग्रह अंतिका प्रकाशन से आया है. मैं तो एक बैठक, एक सांस में पढ़ गया, रात सर्द है, अंधेरा गहरा है, स्ट्रीट लाइट की रोशनी मद्धिम है, दिन के उजाले का पता नहीं, दिल्ली में प्रदूषण कब कम होगा, मालूम नहीं. लेकिन समय बदलेगा, दुनिया बदलेगी इसकी चाह में अविनाश के ये शब्द 'यह मौसम शतरंजी है सो संभल संभल के चलो, उसका क्या, वह मस्त मलंगा मतवाला मारक वजीर है' गुनगुना रहा हूं.
नोट: नई दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में हॉल नंबर-12 में अंतिका प्रकाशन के स्टाल पर अविनाश दास का गजल संग्रह मौजूद है. खरीद कर पढ़ेंगे तो निराश नहीं होंगे. पूरा पैसा वसूल. यदि समय आपका साथ दे तो इस बार मेले में फिल्मकार अविनाश दास से मुलाकात हो जाएगी, हस्ताक्षर भी और फोटो भी आसानी से ले सकेंगे. क्योंकि फिल्म रिलीज होने पर वह सेलिब्रिटी बन चुके होंगे और अगले बरस मेले में उनकी नई किताब आने पर हमारे-आपके लिए उनके पास शायद समय कम हो.

इश्क में माटी सोना'

गांव से शहर और फिर शहर से गांव के रास्ते का सफर इतना आसान भी नहीं जितना दिखता है. यदि यह आसान होता तो गांव और शहर के बीच की दूरी, चमचमाती सड़कों और मिट्टी की पगडंडियों, रंग-बिरंगी रोशनियों से भरी कॉलोनियों और लालटेन की टिमटिमाती लौ की दूरियां भी खत्म हो चुकी होती. जब पिछले सात-आठ दशक से हर शख्स गांव के विकास की बात करता हो लेकिन विकास कोसों दूर हो मानो यह गिरीन्द्र नाथ झा की 'इश्क में माटी सोना' न होकर मुसहर जाति की 'रूपा' और राय टोले के 'उमेश' की बात हो. 
लघु प्रेम कहानी यानी लप्रेक के जरिए जिन छोटी प्रेम कहानियों को पत्रकार रवीश कुमार ने नींव रखी, उसे नए धरातल और नए सिरे से गिरीन्द्र ने लोगों के सामने रखा है. इनकी कहानी सिर्फ प्रेम कहानी भर नहीं है बल्कि एक ऐसे पत्रकार की भी कहानी है जिसने दिल्ली आकर कई सपने संजोए थे लेकिन उन सपनों की मंजिल आर्थिक तौर पर पिछड़े जिले पूर्णिया का एक गांव चनका तो था, लेकिन प्रेम, अनुभव और चिंतन के तौर पर बौद्धिक विकास की सीमाओं से परे था.
कुल 86 पेज में सिमटी प्रेम कहानियां शहर के पते से निकलकर, जिंदगी और प्रेम से नज़्मे गाते हुए, धूप और छांव से गुजरते हुए जमाने की हद से उस पार ले जाता है, जिसके दायरे में दिल्ली है, दिल्ली के तमाम मुहल्ले हैं, दिल्ली की तमाम सड़कें हैं, फेसबुक के साइक्स हैं, गांव के कदम्ब के पेड़ हैं, अष्टजाम है कीर्तन हैं. फणीश्वरनाथ रेणु के बाद के दशकों से पूर्णिया, मधेपुरा, कटिहार, सहरसा, सुपौल, फारबिसगंज के इलाके की कहानी तो सामने आई पर भाषाई पटल पर वह पिछड़े ही रहे. ऐसे में गिरीन्द्र नई आशा के साथ सिर्फ दिखते ही नहीं बल्कि रचते भी हैं क्योंकि वे न सिर्फ शब्दों से खेलते हैं बल्कि नए मुहावरे गढ़ते भी हैं. गाम, नमनेसन, रूपिया, भोज, सिटकनी, अलच्छन, अखिलेसर, सुन्नैर, आलता, दसबजिया, चाह, दुआर जैसे स्थानीय लोक शब्द उनकी कहानियों को विस्तृत फलक देते हैं, वहीं हर कहानी की अलग खास लाइन आपको प्रेम में डुबकी लगाने के लिए मजबूर करते हैं. मसलन, 'हम एकांत में लिखते थे, अपने-अपने हिस्से के मन', 'उजाले में तुम्हारी आंखों का रंग बिलकुल बदल जाता है. क्या आंखों को भी धूप लग गई है', 'तुम्हारे रेणु तुम्हें कैसे लगते हैं-गुलजार के चांद की तरह', 'उसे चांद पसंद था और मुझे तारों भरा आसमान', 'इन किताबों की तमाम महफिलों में भी मुझे तुम ही दिखती हो...जैसे किसी भी गायक को सुनते हुए मेरा मन उसके संगतकार में रमा रहता है', 'काफी की झाग में जिंदगी खोज रहा हूं', 'प्यार भी चांद की कला है शायद, हर रोज नया रूप'.
अनुभव और शब्दों की जादू तमाम कहानियों में है यही कारण है कि कहानी के पात्र कहते हैं, प्रकृति तो बैकग्राउंड म्यूजिक है तुम्हारे होने की सुंदरता का, हम बिहारी लड़कों को दिल्ली में लड़कियों से जाने कितनी बातें सीखने को मिलती है, हमलोग देखते हैं सेक्युलर सपना, जंगली किसान, दिल्ली की जेब में गांव के साथ-साथ कहता है बिन बाप के घर का बड़ा बेटा बहुत जल्दी बाप बन जाता है, वगैरह.
राजकमल प्रकाशन के उपक्रम 'सार्थक' के द्वारा प्रकाशित गिरीन्द्र नाथ झा की कहानियां न सिर्फ प्रेम की गलियों में भटकने के लिए मजबूर करता है बल्कि विक्रम नायक का चित्रांकन भी बरबक्स पन्ने पलटने के लिए मजबूर करता है तभी तो मेरा चार वर्ष का बेटा विज्ञेश इस किताब को 'पढ़ता' है जिसे अभी सही तरीके से पढ़ना नहीं आता. वह तो अभी नर्सरी में ही स्कूली ज्ञान ले रहा है.
आमीन.