12/18/2012

क्लासिक उपन्यास पढ़ता तो मो यान नहीं होता : मो यान

चीनी लेखक मो यान को नोबल पुरस्कार मिलने की खबर सभी चीनी अखबारों, पत्रिकाओं और
वेबसाइटों के पहले पेज पर थी लेकिन खुद लेखक के लिए यह अनिश्चितता की प्रक्रिया का हिस्सा है। शानडांग प्रांत में 1965 में जन्मे मो यान ने अपनी शुरुआती जिंदगी में गरीबी, भूख और अपने कठोर पिता को देखा था। उन्हें अधिक किताबें पढ़ने का मौका ही नहीं मिला लेकिन स्थानीय लोगों से लोककथाएं जमकर सुनीं और वही उनकी लेखनी की जड़ है। उनके उपन्यास 'द रेड सौरगुुम", 'सैंडलवुड डेथ", 'लाइफ एंड डेथ आर वियरिंग मी आउट" और 'फ्रॉग" अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच काफी लोकप्रिय हुए हैं। मो यान से पत्रकार डांग क्वायन की बातचीत के संपादित अंश-
डांग क्वायन : मैं महसूस करता हूं कि लेखक एक मुर्गी की तरह है और उसका लेखन एक अंडे की तरह। हमलोग अंडे खाते वक्त इस बात पर ध्यान नहीं देते कि मुर्गी कैसी थी। चूंकि इस वक्त अंडा सोने का है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति सामान्य तौर पर अंडे देने वाली मुर्गी के बारे में जानने को उत्सुक है और सभी का ध्यान इस ओर है।
मो यान : यदि यह मुर्गी देखने में अच्छी है तो यह लोगों का ध्यान आकर्षित करेगी। लेकिन सिर्फ चमकदार अंडा है तो आप मुर्गी को देखने के लिए समय बर्बाद नहीं करेंगे।
डांग क्वायन : क्या आप मानते हैं कि आपका मूल्यांकन आपके खुद के फैसले के अनुरूप है?
मो यान : मुझे लगता है कि उन्होंने मेरे उपन्यास को समझा है। मैं नहीं जानता कि मुझे अपने कार्यों को लेकर यह कहना सही है या नहीं कि मेरा काम यथार्थवाद और लोककथाओं का मिश्रण है। मैं यह कह सकता हूं कि यह कल्पना के साथ लोककथाओं, सामाजिक समस्याओं और एतिहासिक घटनाओं का मिलाजुला रूप है। हो सकता है कि यह अधिक सटीक हो। जब मैंने सुना कि मैंने नोबल पुरस्कार जीता है तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ और मैं डर भी गया।
डांग क्वायन : सुखद आश्चर्य का मतलब कि आप खुश थे?
मो यान : हां, वास्तव में। सबसे पहले मैं अचंभित था क्योंकि मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि मुझे पुरस्कार मिलेगा। मैं खुश था क्योंकि सबकुछ होते हुए भी मैं अवार्ड विजेता था। लेकिन मैं भयभीत था क्योंकि मुझे अभी तक नहीं मालूम कि इसे कैसे संभाला जाय! यहां कई प्रेस हैं और बतौर नोबल लेखक, मैं नहीं जानता कि इतने लोग मुझे घूरते रहेंगे और मेरी गलतियों को ढूंढेंगे। इसी कारण से मैं डरा हुआ था।
डांग क्वायन : आपकी रचनाओं का दूसरी भाषाओं में अनुवाद हुआ, वे प्रकाशित भी हुई हैं। क्या आप विश्वास करते हैं कि ये संस्करण आपके विचारों को व्यक्त कर रहे हैं जिसे आपने चित्रित किया है?
मो यान : मैं इस मामले में निश्चित नहीं हूं। सभी स्थानों के पाठक एक ही तरह के हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो मेरे काम (साहित्य) को प्यार करते हैं और कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें मैं नहीं जानता। मैं उनका कुछ नहीं कर सकता। वास्तव में, प्रत्येक लेखक के अपने-अपने पाठक होते हैं। मेरे से जो बड़े थे, मैंने उनसे कहानियां सुनी हैं जिनमें परियों की कहानियां, किंवदंतियां, इतिहास, युद्ध, प्रसिद्ध लोगों के अलावा आपदा-संबंधी बातें शामिल थीं।
डांग क्वायन : क्या उन बातों ने आपके लेखन में सहायता की?
मो यान : वे मेरे लेखन के मुख्य स्रोत रहे हैं। मैंने अपने उपन्यासों में पूरी तरह उन्हें शामिल किया है। जिंदगी के वे साल मेरे लेखन की निधि हैं। उन्हें आप आमतौर पर नहीं पा सकते यदि आप लेखक नहीं हैं। लेकिन बतौर लेखक, मेरे लिए खुद ये असाधारण, बहुमूल्य और महत्वपूर्ण हैं। मैं सोचता हूं कि दूसरों के मुकाबले मेरा लेखन इन्हीं मामलों में अलग है। यदि मैं क्लासिक उपन्यास पढ़ते हुए बड़ा हुआ होता तो मैं कभी भी मो यान नहीं बन सकता था।
डांग क्वायन : क्या आप खुश नहीं हैं और क्या आपकी आमदनी बढ़ी है?
मो यान : मैं हमेशा थोड़ा नर्वस हो जाता हूं जब मेरे उपन्यास की बिक्री बढ़ जाती है। जितनी अधिक वह बिकती है, मैं उतना अधिक भयभीत हो जाता हूं। कई पाठक मानते हैं कि नोबल पुरस्कार विजेता के कार्य सर्वश्रेष्ठ होने चाहिए। मुझे डर है कि वे मेरे लिखे साहित्य को पढ़कर काफी निराश होंगे।
डांग क्वायन : क्या आपको लगता है कि नोबल पुरस्कार जीतने के बाद चीनी साहित्य का विस्तार होगा या सबकुछ फिर से सामान्य हो जाएगा?
मो यान :
यह सबकुछ जल्द ही शांत हो जाएगा। लोग पुराने दिनों में लौट आएंगे।
डांग क्वायन : क्या आपको लगता है कि अधिकतर लोग साहित्य में रुचि लेते हैं?
मो यान : पढ़ने का यह बदलाव बस थोड़े से समय का है। यह धीरे-धीरे कम होगा और फिर सभी अपनी-अपनी सामान्य जिंदगी में लौट आएंगे।
स्रोत : सीएनटीवी डॉट सीएन
अनुवाद : विनीत उत्पल
साभार : शिन्हुवानेट डॉट कॉम

3 comments:

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi said...

उम्दा, बेहतरीन...बहुत बहुत बधाई...

Narendra Mourya said...

मैंने मो यान के बारे में कुछ नहीं पढ़ा। यह साक्षात्कार पढ़़वाकर आपने अच्छा काम किया। इसके लिए शुक्रिया। अगर कभी मो यान की कोई रचना का हिन्दी अनुवाद पढ़वा सके तो कहना ही क्या। आपकी पोस्ट ने इस लेखक को पढ़़ने की इच्छा पैदा कर दी है।

Narendra Mourya said...

मैंने मो यान के बारे में कुछ नहीं पढ़ा। यह साक्षात्कार पढ़़वाकर आपने अच्छा काम किया। इसके लिए शुक्रिया। अगर कभी मो यान की कोई रचना का हिन्दी अनुवाद पढ़वा सके तो कहना ही क्या। आपकी पोस्ट ने इस लेखक को पढ़़ने की इच्छा पैदा कर दी है।